मासूम जनता को ठगने के नायाब तरीका, जरिया वेब वर्ल्ड
– देश में नेटवर्क मार्केटिंग के जरिये होती करोड़ो की लूट
– हिंदुस्तान में तेजी से पनपता साइबर फर्जीवाड़ा, लूट कर फरार होती कंपनियाॅ

कानपुर महानगर। हिंदुस्तान के अंदर साइबर क्राइम के द्वारा छली जाने वाली जनता का दर्द किसी से छिपा नहीं है। पिछले हफ्ते ही शहर से करोड़ो की लूट करके भागी फर्जी कंपनी की खबर अधिकतर अखबारों की सुर्खियां बनी रही। शहर ही नहीं वरन् पूरे देश में इस तरह की कंपनियाॅ अपने पांव फैलाती जा रही है। जिन पर लोग अंधश्विास करके भरोसे के साथ अपनी धनराशि को व्यय करते है। लेकिन बाद में सिर्फ कोसने के बाद उनके पास कोई और चारा नही रह जाता है।
आज जिस तरह से समाज में इंटरनेट की दौड़ में हर कोई भाग रहा है वो वक्त दूर नहीं कि जब पूरी जिन्दगी इसी पर निर्भर हो कर रह जायेगी। सबसे अधिक जो बात चिन्ता का विषय बनी है वो है नेटवर्क मार्केटिंग जिसके बल पर करोड़ो कमाने की चाहत के चलते भारतीय ना सिर्फ अपनी परम्परागत बाजारों से दूर होता जा रहा है बल्कि अपनी परंपराओं को भी खोखला करता जा रहा है। इस नेटवर्क मार्केटिंग के कारण छोटे निवेशकों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है तो वहीं छोटी सभी दुकाने बन्द होने की कगार पर है। बड़ी और विश्व व्यापी कंपनियाॅ जिस तरह से भारतीय बाजारों मे नेट के जरिये अपना वर्चस्व कायम करती जा रही है ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि भारतीय व्यवसाय पर जल्द ही अन्तर्राष्टृीय कंपनियों का पूर्णत्या कब्जा होने वाला है।
आज इन्ही नामी गिरामी कंपनियों की तर्ज पर चन्द फरेबी नेटवर्क मारकेंटिंग को अपना हथियार बना कर भारतीय जनता को लूटने में लगे है। जहाॅ एक तरफ ये कंपनियाॅ बड़ा प्रलोभन दिखा कर करोड़ो कमाने के सपने दिखाती है वहीं बाद में जनता के द्वारा किया गया व्यय लेकर भाग जाती है। सबसे हैरत की बात यह है कि इस प्रकार की कंपनियाॅ पहले कुछ पूॅजी का व्यय करती है और जब आम जनता इनके झासे में फस जाती है तो करोड़ो रुपये लेकर ये नदारत हो जाती है। इसी प्रकार के कई प्रकरण अदालतों में फाइलों के ढेर बनते जा रहे है और धूल में दबते जा रहे है। उस पर तमगा यह कि ना ही सरकार इस पर किसी प्रकार से रोक लगा पा रही है और ना ही अब तक कोई ऐसा कानून ही पारित हो पाया है जो इन हादसों पर लगाम कस सके।
इसी क्रम में रतनलाल नगर निवासी अनिल कुमार माथुर जो कि 139-140 हैप्पी टाॅवर के फ्लैट न0 8 के निवासी है उनके साथ भी कुछ ऐसा ही घफला हुआ जिसमे अनिल अकेले ही नहीं है बल्कि उनके साथ कई लोग इस धोखाधड़ी के शिकार हुये और आॅन लाइन पैसे कमाने का लालच देने वाली कंपनी करोड़ो रुपये लेकर भाग गई आज स्थिति यह है कि अनिल एवं अन्य लोगों को अपने रुपयों के जाने से ज्यादा इस बात का मलाल है कि उनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। वैसे तो ना जाने कितनी ही खबरे इस प्रकार की अखबारों मे रोज ही अपनी जगह बनाती है लेकिन फिर भी अब तक इस तरफ कोई भी ठोस कदम उठाने वाला नहीं है। इस मामले मे जब अवधनामा संवाददाता ने अनिल से संपर्क किया तो अनिल ने जानकारी देते हुए बताया कि दो साल पहले अल्पारी बिजनेस डेवलपर नाम की कंपनी ने कानपुर में आकर लोगों के बीच अपनी पकड़ बनानी शुरु करी और साथ ही उसमें सबको पैसा लगाने को प्रोत्साहित किया। पहले तो किसी ने भी इस पर ध्यान नही दिया लेकिन कुछ ही समय में इसके कथिक संचालक सचिन अरोड़ा जिनका वास्तविक नाम दीपचंद्र गर्ग है और यह गोविन्दगढ़ जिला संगरुर पंजाब का निवासी है और इसका जोड़ीदार विपिन जादौन जो कि हैरीटेज स्कूल टृांस यमुना कालोनी रामबाग आगरा का निवासी बताया जाता है दोनो ने मिलकर लोगों को अपनी बातो के द्वारा अपने जाल में फसाना शुरु कर दिया जिसमें धीरे-धीरे सबके मन मे यह बैठाया गया कि जो भी रुपया जमा किया जायेगा उसका दो प्रतिशत तुरंत ही जनता के खाते में जमा कर दिया जायेगा। कुछ लोगो ने भरोसा करके दस से पन्द्रह हजार तक की छोटी छोटी कई रकमों को व्यय किया और उनको उसका अगले माह ही दो प्रतिशत का मुनाफा भी उनके एकाउंट में पहुच गया जिससे लोगों का विश्वास इस कंपनी में होने लगा। अब इस कंपनी का दूसरा कदम था जिन लोगों को भरोसा दिलाया है उनको किसी तरह से सामने करके दूसरे लोगों को अपने मकड़जाल में फसाना और इसके लिए भी उन लोगों के दिमाग में पहले से ही रास्ता था जिसके द्वारा जो गिने चुने लोग फसे थे उनको ही दूसरो के सामने करके यह दिखाया कि यह सभी इसी कंपनी के एजेन्ट है और दूसरी तरफ पहले से फस चुके व्यक्तियों को यह बताया कि कंपनी बाहरी लोगों से विज्ञापन की जगह आप लोगों को ही मुनाफा बढ़ा कर देगी जिससे आपको भी फायदा और दूसरे को भी फायदा होगा। उनके प्रलोभनो में अनिल कुमार माथुर के साथ दूसरे सदस्यों ने भी इसमे अपना फायदा देखा और उनको कंपनी के सचिन अरोड़ा उर्फ दीपचंद्र गर्ग और विपिन जादौन के द्वारा बिछाया गया जाल नजर ही नहीं आया। यह शुरुवात थी अभी तो और भी होना बाकी था। जब अनिल और दूसरे साथियों ने देखा कि बराबर पैसा तो एकाउंट में आ रहा है तो उन पर भी लालच हावी हुआ और पहले से ज्यादा बड़ी रकम केा व्यय करने का मन बनाकर उन्होने और ज्यादा रकम लगानी शुरु करी साथ ही दूसरो ने भी इनकी देखा देखी पहले से बड़ी रकम को कंपनी में व्यय कर दिया। हालात यह हो गये कि जो रकम कुल पांच से दस लाख के बीच थी वो अब करोड़ो में पहुच चुकी थी और कंपनी के खातो में इतनी बड़ी इमदाद के आते ही असल खेल सामने आया और कंपनी के सचिन अरोड़ा और विपिन जादौन करोड़ो रुपये लेकर फरार हेागये। अनिल और उनके जैसे दुसरे साथियों को कुछ माह तक उनके खातों में आने वाली धनराशि सुचारु रुप से आती रही लेकिन एक दिन वो सिलसिला भी खत्म हो गया और जब दो बार में खाते में कमीशन का धन नही आया तो सबको कुछ फिकर हुई जिस पर अनिल और दूसरे लोगों ने मिल कर जानकारी करी तो पहले तो कंपनी से मैसेज आया कि जल्द ही कमीशन आ जायेगा लेकिन बाद में कमीशन ना आने पर जब दुबारा जानकारी करने का प्रयास किया गया तो पता चला कि कंपनी बन्द हो गई है अब वहाॅ से किसी प्रकार का लेन देन नही हो पायेगा। इतना जानने के बाद अनिल और दूसरे जिन लोगों ने अपना धन इस कंपनी में लगाया था सभी सकते में आ गये और फिर सबने जाच करना शुरु किया तो पता चला कि जिस कंपनी का नाम लेकर उनसे रुपये निकवाये गये है असल में ऐसी कोई कंपनी है ही नही और जो इस खेल के मास्टर माईड थे वो भी फरार हो चुके थ। इतनी जानकारी के बाद जाहिर था कि सभी लोग सकते में आ गये और कुछ लोगों ने इस पर और जानकारी निकाली तो पता लगा कि जिस कंपनी का टिन नंबर दिखा कर उनके साथ धोखा किया गया है असल में वो कपनी बन्द हो चुकी है और उसका कोई वर्तमान में वजूद ही नही है साथ ही जिस सचिन अरोड़ा को उसका सर्वेसर्वा बताया जाता था असल में उसका नाम तक गलत है बल्कि उसका असली नाम दीपचन्द्र गर्ग है और पंजाब के संगरुर जिला का रहने वाला है।
कंपनी में तो ताला लग चुका था लेकिन जिनका पैसा लगा था उन्होने जब गोविन्द नगर थाने में मामले की जानकारी दी और मुकदमा लिखने को कहाॅ तो उनकी वहाॅ किसी ने नहीं सुनी बल्कि उनको वहा से चले जाने को कहाॅ। जिससे आहत होकर दूसरे लोगों ने अनिल को अपना निशाना बनाया क्यो कि अनिल उनमें थे जिन्होने उस कंपनी में पहले पैसे लगाये थे बल्कि यह कहाॅ जाये कि अनिल को ही दिखा कर दूसरों के दिमाग को कंपनी मे व्यय करने के लिये तैयार किया गया तो गलत नही होगा। जितनी भी कंपनियों ने इस तरह के कारनामों को अन्जाम दिया है वो सभी लमसम एक ही ढर्रे पर चलती है। जिस शहर को निशाना बनाया वहाॅ के लोकल व्यक्तियों को नौकरी या कमीशन का झासा देकर सामने कर देती है जिसमें जब वो उस जगह पर काम की शुरुवात करे तो दूसरे लोगों को यकीन हो जाये कि वो सही कंपनी है। और होता भी यही है लेकिन जब कंपनी भागती है तो सबसे पहले पकड़े भी यही लोग जाते है। और ऐसा ही हुआ अनिल के साथ एक तरफ तो खुद उसका लाखो की धनराशि भी डूब चुकी थी और दूसरा दूसरे लोगो का उस पर दबाव पड़ने लगा। पूरी तरह हलाकान हो चुके अनिल ने काफी प्रयास किया कि गोविन्द नगर थाने में उसकी दरख्वास्त मंजूर हो जाये लेकिन अफसोस वहा कोई सुनने वाला ही नहीं था। ऐसे में अनिल ने कचेहरी का रास्ता पकड़ने की सोची पर उसका साथ कोई नहीं दे रहा था इसी बीच अनिल की मदद के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज कुमार निगम ने अनिल का पूरा सहयोग करने का वादा किया तो अनिल के जान मे जान आई । मनोज कुमार निगम ने अनिल के केस को पूरी तरह से ना सिर्फ समझा बल्कि उनको यह भी समझ आ गया कि इस केस में अनिल को तथाकथित कंपनी ने सिर्फ एक चारे की तरह प्रयोग किया है। मनोज निगम ने स्वयं गोविन्द नगर थाने जा कर मुकदमा लिखवाने का प्रयास किया लेकिन उनकी भी सुनवाई नही की गई जिससे अजिज होकर मनोज निगम ने माननीय न्यायालय की शरण में जाना उचित समझा और जल्द ही आदेश भी हो गया कि गोविन्द नगर थाने में मुकदमा दर्ज किया जाये। काफी हीलाहवाली के बाद और न्यायिक आदेशो के दबाव वश अनिल की दरख्वास्त पर मुकदमा लिखा गया लेकिन पुलिस विभाग का रवैया काफी खस्ता हाल रहा यही नही उन्होने तो मनोज पर ही शिकंजा कसना शुरु कर दिया कि असली दोषी वही है। पुलिस के भारी दबाव के कारण अनिल पूरी तरह से टूट चुका है। अनिल के अनेसार उसका अपना धन भी डूब चुका है और अगर वो गलत होता तो वो भी भाग चुका होता। इस कहानी को लिखे जाने तक थाने में मामला 467 व अन्य के अर्तगत लिखा जा चुका है।
वैसे तो वेब की दुनिया आज के समय को देखते हुए बहुत ही जरुरी है लेकिन बात जब व्यवसाय की हो तो अभी भी कई ऐसे नियम बनने जरुरी है जिनके जरिये इस प्रकार के फ्राड को रोका जा सके। यहाॅ तक कि कई सरकारी बैंके जैसे एसबीआई, इलाहाबाद बैंक, आईडीबीआई, एचडीएफसी, आईसीआईसीआई जैसी बैंको में इस तरह की कंपनियों खातो का होना वो भी जाली दस्तावेजो के बल पर सरकारी प्रक्रिया के अन्दर छुपी लचर प्रणाली को सामने लाने के लिए काफी है। साथ ही इन बातो की ओर भी ईशारा कर रही है कि आधार कार्ड को बैंको में मानक तो बना दिया गया लेकिन जब बात सही से जाच की होती है तो वो दूर-दूर तक नजर नही आता है। इस बात से भी गुरेज नही कर सकते है कि कही ना कही बैंक कर्मचारियों की भी मिलीभगत रही होगी क्यो कि जाली दस्तावेजो को सही से जाचा परखा नहीं गया जो इस बात की ओर ईशारा कर रहा है कि या तो इसमें लालच को हथियार बनाया गया है या फिर बैंक कर्मचारियों की लापरवाही के च लते हुआ है लेकिन सत्य तो यही है कि चूक तो हुई है।
इन सबसे इतर कोई ऐसा नियम अभी तक नहीं बना है जो रजिस्टर्ड हो चुकी कंपनी केा सही तरह से जाच सके और कि वो कंपनी वर्तमान में है भी या नही और साथ ही उसका टिन नम्बर उसको भी समय सीमा में बाधना जरुरी है जिससे कि अगर किन्ही कारणों से कंपनी बन्दहो जाये तो एक समय के बाद कोई भी सेवी की आॅनलाइन साइड पर जाकर देखे तो उसे पता चल सके कि यह कंपनी बन्द हो चुकी है। इसके अलावा नेटवर्क मार्केटिंग के लिये भी कुछ कानून सख्ती से बनने चाहिये।
कहने को तो वेब की दुनिया सभी के लिए जानकारी जुटाने का एक महत्वपूर्ण जरिया है लेकिन यही दुनिया आपके जीवन में किसी भी रुप में आकर उसे नष्ट भी करने की क्षमता रखती है। फिलहाल नेटवर्क कंपनियों के द्वारा होने वाली इस प्रकार की लूटे समाज को सोचने पर मजबूर जरुर कर रही है कि यह हमारे देश की तरक्की है या फिर पिछड़ापन क्यों कि इस तरह के प्रलोभन से समाज का एक विकृत स्वरुप सामने आता है। अब समय है बदलाव और सुधार का जो कि हमारे देश की दिशा और दशा दोनो को बदल सके।

सर्वोत्तम तिवारी की रिपोर्ट
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