Thursday, February 26, 2026
spot_img
HomeMarqueeफर्जी मुकदमों से परेशान अधिवक्ता, चंद बिकाऊ अधिकारियों ने किया जीना दूभर

फर्जी मुकदमों से परेशान अधिवक्ता, चंद बिकाऊ अधिकारियों ने किया जीना दूभर

फर्जी मुकदमों से परेशान अधिवक्ता, चंद बिकाऊ अधिकारियों ने किया जीना दूभर
– दूसरों को न्याय दिलाने वाले को ही जब न्याय नहीं तो जनता किससे करे उम्मीद
– कप्तान ने भी झाड़ा पल्ला, दर-दर ठोकरे खाने  को विवश अधिवक्ता
कानपुर महानगर। जहाॅ एक ओर तो सभी को न्याय दिलाने के कई नियम बन रहे है। वहीं दूसरी ओर न्याय की आस में जनता की तड़प बढ़ती जा रही है। इन हालातो में स्वयं जनता के लिए मार्गदर्शक का कार्य करने वाले अधिवक्ता को स्वयं के लिऐ न्याय की दरकार हो तो कहने ही क्या। ऐसा ही हाल है मनोंज सिंह का जो न्यायालय के न्याय के बाद भी दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर है। ना तो कोई सुन रहा है और ना ही किसी को उन पर तरस ही आ रहा है। उस पर एसएसपी भी पूरी तरह से अपना पल्ला समेटते नजर आये तो इसे करेला उपर से नीम चढ़ा ही कहाॅ जायेगा।
कुछ भूमाफियाओं के सामने ना झुकने वाले अधिवक्ता मनोज कुमार सिंह पर थाना स्वरुप नगर के चन्द बिकाउ अधिकारियों की मिलीभगत के चलते रिपोर्ट दर्ज कराई गई जिसका मुकदमा 309/2015 में लिखा गया। आरोप पत्र तो दाखिल कर दिया गया लेकिन इसमें किसी भी तरह का बयान मनोज कुमार सिंह से लेना जरुरी नहीं समझा गया। मनोज को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होने सभी साक्ष्यों को एकत्रित करके जिला एवं सत्र न्यायालय में एक प्रकीर्ण 676/2017 दर्ज कराई जिसमें प्रस्तुत किये गये सभी साक्ष्य को देख कर न्यायालय द्वारा सम्पूर्ण जानकारी तलब करवाई गई। जिससे यह बात सामने आई कि रिपोर्ट को लिखवाने वाले थाना इंचार्ज संजय द्विवेदी ने साॅठ-गाॅठ के चलते जानबूझ कर मनोज के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था जिसमें किसी भी प्रकार के सबूतो को भी दरकिनार कर दिया गया था। उस वक्त उनकी मंशा साफ लेन देन की नजर आती है अन्यथा कानून की सुरक्षा करने वाले हाथों से इस प्रकार गलत केस दर्ज करना किसी खास उद्देश्य की तरफ साफ इशारा करता ही नजर आता है। जब जिला एवं सत्र न्यायालय ने पूरे विवरण को संज्ञान में लिया तो बात स्वतः ही स्पष्ट हो गई कि पूरा क्रियाकलाप एक षड़यंत्र के अंतर्गत किया गया था। जिसमें बेवज ही अधिवक्ता को फसाने की साजिश रची गई थी। इसके बाद न्यायालय 29/06/2017 को मनोज के पक्ष में न्याय सुनाते हुऐ साफ शब्दों में कहाॅ कि मनोज अपने खिलाफ साजिश रचने वाले लोगों के खिलाफ स्वरुप नगर थाने में ही रिपोर्ट लिखा सकता है और अगर उसके बाद भी उसकी सुनवाई नहीं होती है तो एक बार पुनः न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है और पूरी तरह से न्याय की उम्मीद कर सकता है। इसके बाद मनोज ने न्यायालय के आदेशों को लेकर एक बार पुनः स्वरुप नगर थाने के द्वार पर दस्तक दी लेकिन जैसा कि उनको पहले से ही उम्मीद थी उनकी सुनना तो दूर बल्कि थाने से उनको जलील करके भगा दिया गया और न्यायलय के आदेश को भी उसके मुॅह पर मारते हुए वहाॅ से भाग जाने को कहाॅ गया। मनोज ने फिर भी हार ना मानते हुऐ इसकी शिकायत लिखित रुप से एसएसपी को भेजी लेकिन उनकी शिकायते कूड़े की टोकरियों में जाने लगी उसके बाद थक हार कर जब मनोज ने अपनी आप बीती अपने खैरख्वाह और साथी अधिवक्ता एन के अग्निहोत्री को बताई तो उन्होने उनका हौसला बढ़ाते हुए उनको अपनी लड़ाई जारी रखने को कहाॅ साथ ही उनके सहयोग का वादा करते हुऐ मनोज की तरफ से एक नोटिस एसएसपी अखिलेश सिंह मीणा को भेजी जिसमें उन्होने पूर्व में भेजी गई सभी दरख्वास्तों का हवाला देते हुऐ 15 दिन के अन्दर कार्रवाही करने की प्रार्थना करी पर नोटिस के बाद एसएसपी कार्यालय से जो जवाब आया वो भी मनोज को हिला देने के लिये काफी था। एसएसपी साहब ने साफ तौर पर न्यायलय के आदेशों पर ही उॅगली उठाते हुऐ अपनी समझ के अनुसार मनोज के केस को बलहीन बताते हुऐ अपना निर्णय थोप दिया जिसके अनुसार पहली ही नजर में कोई भी समझ जायेगा कि जिस केस में माननीय न्यायालय को फर्जी वाड़ा नजर आ रहा है उस केस में एसएसपी साहब को कुछ नहीं नजर आ रहा है। अब इसे एसएसपी साहब की समझदारी कहेगे या फिर उनका तजुर्बा जो कि न्यायालय के आदेश को भी पीछे ढकेल रहा है। उस पर भी तमगा यह कि अगर मनोज को लगता है कि उनके साथ कोई गलत कर रहा है तो वो फिर से न्यायालय जाये या फिर स्वरुप नगर थाने मे जाकर मामला दर्ज कराये इसके साथ ही अन्तिम लाइने हास्यास्पद है जिसमें एसएसपी साहब का कहना है कि मनोज कुमार सिंह के प्रार्थना पत्र पर विचारोपरान्त थाना स्थानीय स्वरुपनगर में अभियोग पंजीकृत किया जा चुका है 641/18 के अन्र्तगत।
एसएसपी साहब ने एक ही कागज पर अपने दो विचारों को प्रदर्शित करके अपन ही समझ पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। जब श्रीमान् जी को मनोज कुमार सिंह का प्रार्थना पत्र बलहीन नजर आया जिसके आधार पर उसको निरस्त कर दिया गया था तो फिर उनके ही प्रार्थना पत्र पर अभियोग पंजीकृत क्यों किया गया जबहि वो सही नहीं था। लेकिन इसमें एक अच्छाई यह हुई कि माननीय न्यायालय के आदेशों को दरकिनार ना कर सके और आनन फानन में थाना स्वरुप नगर को मनोज कुमार सिंह की तरफ से मामला दर्ज करने का आदेश देते हुये स्वयं संज्ञान में लिया और कार्रवाही को आगे बढ़ाने में सहयोग भी किया। लेकिन इन परिस्थितियों में पोलिस प्रसाशन के दोमुहे स्वरुप स्वतः ही सामने आ जाते है। आखिर  पोलिस के द्वारा कब तक न्याय की आस में लोगों को भटकना होगा। कब तक इसी प्रकार ठोकरे खाने को मजबूर होना होगा। हर दिन सौ से भी ज्यादा केस अदालतों में दर्ज होते है लेकिन वो सिर्फ फाइलों के ढेर के रुप में धूल और गर्द में दबते चले जाते है और जिन केसो में समय के अन्दर ही कार्यवाही होती है उनपर पोलिस गर्द डाल देती है। कमोबेश यही स्थिति हामारे समाज को दीमक की तरह खोखला कर रही है जिससे जवानी में शुरु होने वाले केस मृत्यु के बाद तक खिचते रहते है। इस कहानी को लिखने से पूर्व जब हमारे संवाददाता ने वर्तमान स्वरुप नगर थानाध्यक्ष अभय नारायण से इस केस की बाबत जानकारी चाही तो उनका जबसव था कि बहुत से केस है इसकी हमें जानकारी नहीं है पहले हम जानकारी कर ले फिर बता पायेगे परन्तु कई घण्टों के बाद भी जानकारी ना कर सके जिससे साफ जानकारी होती है कि पोलिस महकमा हर बात से खुदको साफ बचाने के प्रयास में अपनी फजीहत ही करवा रहा है। यह जरुर है जब कानपुर शहर के प्रशासन के द्वारा एक अधिवक्ता के साथ इस तरह का व्यवहार हो रहा है तो आम जनता इनसे क्या उम्मीद रखेगी।
सर्वोत्तम तिवारी की रिपोर्ट
———————————————————————————————————————
अगर आप भी चाहते है अपने मोबाइल पर खबर तो तुरंत इस 9918956492 नंबर को अपने फ़ोन में अवधनामा के नाम से सेव करे और हमे व्हाट्सप्प कर अपना नाम और जिला बताये और पाए अपने फोन पर लेटेस्ट खबरे 
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img
- Advertisment -spot_img
- Advertisment -spot_img
- Advertisment -spot_img

Most Popular