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पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव देश के तीन राजनीतिक ध्रुवों भाजपा, कांग्रेस और माकपा के लिए बेहद अहम है।देश में तेजी से बढ़ रही भाजपा इन तीनों राज्यों में भी कमल खिलाने के मंसूबे के साथ चुनावी समर मे हैं।वह तीनों राज्यों में स्थानीय दलों के साथ गठबंधन की तैयारी में भी है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजेपी पूर्वोत्तर के सभी सात राज्यों में अपना परचम फहराना चाहती है। गौरतलब है कि केंद्र में सत्ता आने के बाद भाजपा ने पूर्वोत्तर में तेजी से पांव पसारे हैं। सिक्किम समेत आठ राज्यों में से असम, अरुणाचल और मणिपुर में उसकी सरकारें हैं। सिक्किम का सत्तारूढ़ एसडीएफ और नगालैंड का सत्तारूढ़ एनपीएफ उसके साथ
राजग गठबंधन में शामिल है।बीते साल असम चुनावों में भारी जीत और फिर मणिपुर में सरकार के गठन से उसके हौसले बुलंद हैं।
राजग गठबंधन में शामिल है।बीते साल असम चुनावों में भारी जीत और फिर मणिपुर में सरकार के गठन से उसके हौसले बुलंद हैं।

वहीं कांग्रेस व माकपा के सामने अपनी सरकारों को बचाने की चुनौती है।राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद ये पहले चुनाव हैं जिसमे उनके नेतृत्व की काबलियत का भी सही पता चलेगा।मिशन 2019 के मद्देनजर इन तीनों राज्यों में यूं तो लोकसभा की सीटें महज पांच ही है, लेकिन इन राज्यों के नतीजों का राजनीतिक महत्व उत्तर भारत के राज्यों से कम नही है।भाजपा भले ही केन्द्र मे सरकार चला रही है और बड़े राज्यों मे भी उसकी सरकार है।त्रिपुरा, मेघालय वा मिजोरम को लेकर भाजपा नेताओं के दावे और मंसूबे भले ही काफी ऊंचे हों। लेकिन अब तक का इन तीन खूबसूरत राज्यों का चुनावी इतिहास भाजपा के मंसूबे या दावे से कतई मेल नही खाता है।दरअसल इन राज्यों मे फिलहाल भाजपा की हैसियत जमानत जब्त पार्टी की है।इन राज्यों मे उसका वोट प्रतिशत भी कुछ खास नही है।आने वाले चुनावों मे भाजपा के लिए बड़ी चुनौती सेवन सिस्टर वाले इन राज्यों मे खुद पर लगा जमानत जब्त पार्टी का ठप्पा हटाने कि होगी।
पूर्वोत्तर राज्यों में राजनीतिक असर की बात करें तो देश को आजादी मिलने के बाद से दशकों तक कांग्रेस का दबदबा रहा है। ये बात अलग है कि कांग्रेस के दबदबे को कम करने के लिए क्षेत्रीय दलों ने कमर कसी। लेकिन सुविधा के मुताबिक कभी कांग्रेस के साथ गए तो कभी विरोध भी करते रहे। इन सबके बीच भाजपा इन इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम रही। लेकिन अब समय से साथ बहुत कुछ बदल रहा है। देश के 19 राज्यों में भाजपा और उसके समर्थकों की सरकार है। अब भाजपा कोशिश कर रही है कि उसका विजय रथ कुछ यूं आगे बढ़े कि पूर्वोत्तर राज्य केसरिया रंग में रंग जाएं।भाजपा अध्यक्ष अमितशाह,प्रधानमंत्री मोदी और संघ के तमाम प्रचारक और नेता चुनावी ऐलान के बहुत पहले से ही इन राज्यों पर मंथन कर रहें है।अगर हम त्रिपुरा की बात करें तो देश मे ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि किसी भी राज्य में सीपीएम और बीजेपी सीधी टक्कर में आमने सामने हैं ,और त्रिपुरा इसका गवाह बनने जा रहा है।चूंकि त्रिपुरा माकपा का गढ़ रहा है और वह 1978 के बाद से 40 साल में केवल पांच साल 1988 से 1993 के बीच ही सत्ता से बाहर रही है।उसके मुख्यमंत्री मानिक सरकार 1998 से लगातार मुख्यमंत्री हैं।साल 2013 के चुनाव में माकपा को 60 में से 49 सीटें मिली थीं।इससे साफ है कि यहां का चुनावी आकंड़ा कमसकम अभी भाजपा के हक मे नही है।2013 के चुनाव में बीजेपी ने 50 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी। 2008 में भी पार्टी के 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी। इसी तरह 2003 में बीजेपी के 21 उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा सके थे। 1998 में पार्टी ने पहली बार राज्य की सारी 60 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी के 58 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।लेकिन अगर पांच साल पुराने आंकड़ों से इतर देखें तो त्रिपुरा मे समीकरण कुछ बदले हुए दिख रहें हैं। भाजपा ने आदिवासी बहुल इस राज्य में स्थानीय निकाय में बेहतर प्रदर्शन कर माकपा को सीधी चुनौती दी है। वह राज्य मे क्षेत्रीय दल आईपीएफटी से गठबंधन की कोशिश भी कर रही है। भाजपा की कोशिश इस वामपंथी गढ़ को ढहाने की है, जिससे संदेश एक राज्य की सत्ता से ज्यादा राजनीतिक होगा।क्यों कि भाजपा और वाम दलों की खुन्नस बहुत पुरानी है।संघ अर्से से राज्य में बीजेपी की जमीन तैयार करने का काम कर रहा है। संघ के चलते ही बीजेपी असम की सत्ता पर विराजमान हुई है।कहा जाता है कि आरएसएस का आदिवासी क्षेत्रों में पर्याप्त जमीनी आधार है।भाजपा ने भी मजबूत संगठनात्मक आधार बनाया है।काबिले गौर है कि संघ संबद्ध संगठन राज्य में
स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहें हैं। इसी मजबूत आधार के जरिए बीजेपी पूर्वोत्तर क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाना चाहती है।
त्रिपुरा के भाजपा अध्यक्ष बिप्लव कुमार देव को केन्द्र सरकार की उज्जवला योजना से भी अपने पक्ष मे माहौल बनता दिख रहा है।देव कहते हैं कि प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत 3.33 लाख महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराए गए हैं। एक परिवार में औसतन चार सदस्यों का हिसाब रखें तो राज्य के 25 लाख में से आधे वोटरों को इसका लाभ मिला है। उनका कहना है कि राज्य के लोग भाजपा के पक्ष में हैं और अगले चुनाव के बाद पार्टी राज्य में सरकार बनाएगी।
त्रिपुरा के लिए बीजेपी ने हिमंत बिस्व सरमा को प्रभारी बनाया है, जिन्हें असम में बीजेपी की सरकार बनवाने का क्रेडिट हासिल है।वैसे त्रिपुरा में भी भाजपा की नजर हिंदू वोटबैंक पर टिकी है।खासकर नाथ संप्रदाय को मानने वाले वोटरों पर।आंकड़ों के हिसाब से त्रिपुरा में तकरीबन 35 फीसदी आबादी नाथ संप्रदाय से है।यानी कुल 30 लाख की आबादी वाले इस राज्य में नाथ संप्रदाय से जुड़े लोगों की संख्या 12-13 लाख है। यानी एक तिहाई आबादी नाथ संप्रदाय को मानती है।इसी लिए त्रिपुरा के लिए बीजेपी के पास एक ट्रंप कार्ड है जिसका नाम है,योगी आदित्यनाथ।ये सवाल जायज है कि यूपी के सीएम त्रिपुरा में ट्रंप कार्ड कैसे हो सकते हैं?दरअसल योगी आदित्यनाथ पूरे देश में नाथ संप्रदाय के प्रमुख माने जाते हैं।बताया जाता है कि योगी को लेकर यहां के लोग खासे उत्साहित भी हैं।वैसे तो योगी आदित्यनाथ बीजेपी के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनावों में भी सफल प्रचार कर चुके हैं। लेकिन त्रिपुरा में वो पार्टी के लिए सबसे बड़े स्टार साबित हो सकते हैं।इस बात को एक और तरह से समझा जा सकता है।दरअसल योगी नाथ संप्रदाय की गोरक्षनाथ पीठ के महंथ भी हैं।
त्रिपुरा में गोरक्षनाथ के दो मंदिर हैं, एक अगरतला में और दूसरा धर्मनगर में।त्रिपुरा में करीब 84 प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है।वहां कई सालों से लेफ्ट को कांग्रेस चुनौती देती आयी है लेकिन अब उसका मुकाबला कांग्रेस की बजाय बीजेपी से है।कांग्रेस की लोकप्रियता राज्य में काफी गिरी है।कांग्रेस कमजोर इसलिए भी हुई है क्योंकि उसके 6 विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और कुछ महीने पहले वो सभी बीजेपी में चले गए हैं। वर्तमान में त्रिपुरा में 51 सीटें लेफ्ट के पास हैं। 3 सीट कांग्रेस और 6 सीट बीजेपी के पास हैं। जहां त्रिपुरा विधानसभा के नतीजों के बाद भाजपा का जीरो बैलेंस था।वहां पर अब उसके 6 विधायक हैं।
एक बात और त्रिपुरा में नाथ संप्रदाय को मानने वाले ओबीसी कोटे में आते हैं, लेकिन उन्हें आरक्षण का फायदा बरसों बाद अब तक नहीं मिल पाया है।एससी और एसटी को मिल रहे 48 फीसदी आरक्षण के कारण त्रिपुरा की माणिक सरकार अब तक हाथ खड़े किये हुए हैं।यही वजह है कि राज्य कि नाथ संप्रदाय को मानने वाली एक तिहाई आबादी को योगी आदित्यनाथ से कुछ ज्यादा ही उम्मीद जग चुकी है। त्रिपुरा की एक-तिहाई जनसंख्या आदिवासी समुदाय से आती है और ये करीब 20 सीटों में किसी उम्मीदवार को जिताने और हराने का माद्दा रखती हैं।बीजेपी इन्ही आदिवासी क्षेत्रो में रैलियां आयोजित करके माणिक सरकार की खामियों को उजागर कर रही है।साथ ही
साथ शहरी क्षेत्रो में भी आक्रामक प्रचार करके लेफ्ट को घेरने का प्रयास कर रही है।वैसे भाजपा अपने चुनाव अभियान में तेजी लाने के मकसद से 31 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी की दो रैलियां आयोजित करने वाली है।भाजपा नेता अपने दावों को मजबूब करने के लिए एक आंकड़ा ये भी पेश कर रहें हैं कि पिछले चुनाव में ऐसी 30 सीटें देखी गयीं जहां लेफ्ट उम्मीदवारों की जीत का फासला तीन हजार से भी कम रहा।बीजेपी को भरोसा है कि इस बार वो ऐसी सारी सीटें अपनी झोली में बटोर सकती है।इसी लिए पहली बार भाजपा को लग रहा
है कि वो त्रिपुरा में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है।लेफ्ट के गढ़ पर कब्जा ज़माने के लिए वह बहुत आतुर है। बीजेपी ने केरल में बहुत कोशिश की थी लेकिन नाकामी हासिल हुई थी।त्रिपुरा के रूप में उसे एक उम्मीद नजर आ रही है।त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने भी स्वीकारा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में केवल लेफ्ट और बीजेपी के बीच ही मुक़ाबला होगा।उन्होंने साथ ही ये भी आरोप लगाया कि बीजेपी अलगाववादी तत्वों से हाथ मिला रही है और धार्मिक एवं जातीय आधार पर राज्य के लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है।मतलब साफ हैं लेफ्ट के लिए अपने ही गढ़ में खतरे बहुत हैं।उसे डर लग रहा है कि कहीं बीजेपी आगामी चुनाव में उसे हरा न दे।लेफ्ट त्रिपुरा में कई वर्षो से राज कर रही हैं और इस बार के चुनाव में उसे सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है।वहीं असम में जीत के बाद बीजेपी को लगा कि त्रिपुरा में भी वो जीत का परचम लहरा सकती हैं और उसके बाद से ही बीजेपी के बड़े नेता वहां लगातार अपना दौरा कर रहे हैं।पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने त्रिपुरा में रैली करके पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंकने का काम किया है।
अमितशाह ने तो आदिवासी के घर में खाना भी खाया है ताकि आने वाले चुनाव में उन्हें साधा जा सके।दूसरी तरफ राहुल गांधी का जितना जोर कर्नाटक पर नजर आ रहा है, नॉर्थ ईस्ट को लेकर अभी वैसा कुछ नहीं दिखा है। कर्नाटक में चुनाव मई में होने की उम्मीद है और फरवरी में राहुल गांधी तीन दिन के कर्नाटक दौरे पर जाने वाले हैं।साफ है कि उनमे हिमाचल जैसी भी गम्भीर नही दिख रही है।चुनाव आयोग नें नॉर्थ ईस्ट के तीन राज्यों के लिए बाद मे किसी हुज्जत से बचने के लिए इस बार ईवीएम के साथ वीवीपैट का भी इस्तेमाल करने की घोषणा की है और कहा है कि उम्मीदवारों ईवीएम चेक करने का भी मौका मिलेगा, बशर्ते ऐसा वे चाहते हों। त्रिपुरा में 18 फरवरी को जबकि मेघालय और नगालैंड में 27 फरवरी को वोटिंग होगी।सभी राज्यों के वोटों की गिनती 3 मार्च को होगी और नतीजे भी साथ ही
आएंगे।सारी कवायद के बाद कहा जा सकता है कि त्रिपुरा की माणिक सरकार को बीजेपी का डर सता रहा है।उन्हें शक है कि लेफ्ट का गढ़ कहीं 2018 में मिट न जाये।इसका अंदाजा इस बात से भी लग रहा है कि अपनी ईमानदारी के लिए पहचाने जाने वाले माणिक ने हाल ही में अगरतला में हिंदू संप्रदाय के अनुकूल ठाकुर के समर्थकों के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था जिसको लेकर काफी विवाद पैदा हुआ था कि वामपंथी विचारधारा का मुख्यमंत्री ऐसे कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ।उन्होंने चाहे जिस मकसद से उस कार्यक्रम में हिस्सा लिया हो लेकिन बीजेपी को एक शानदार मुद्दा जरूर थमा दिया।
पूर्वोत्तर राज्यों में राजनीतिक असर की बात करें तो देश को आजादी मिलने के बाद से दशकों तक कांग्रेस का दबदबा रहा है। ये बात अलग है कि कांग्रेस के दबदबे को कम करने के लिए क्षेत्रीय दलों ने कमर कसी। लेकिन सुविधा के मुताबिक कभी कांग्रेस के साथ गए तो कभी विरोध भी करते रहे। इन सबके बीच भाजपा इन इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम रही। लेकिन अब समय से साथ बहुत कुछ बदल रहा है। देश के 19 राज्यों में भाजपा और उसके समर्थकों की सरकार है। अब भाजपा कोशिश कर रही है कि उसका विजय रथ कुछ यूं आगे बढ़े कि पूर्वोत्तर राज्य केसरिया रंग में रंग जाएं।भाजपा अध्यक्ष अमितशाह,प्रधानमंत्री मोदी और संघ के तमाम प्रचारक और नेता चुनावी ऐलान के बहुत पहले से ही इन राज्यों पर मंथन कर रहें है।अगर हम त्रिपुरा की बात करें तो देश मे ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि किसी भी राज्य में सीपीएम और बीजेपी सीधी टक्कर में आमने सामने हैं ,और त्रिपुरा इसका गवाह बनने जा रहा है।चूंकि त्रिपुरा माकपा का गढ़ रहा है और वह 1978 के बाद से 40 साल में केवल पांच साल 1988 से 1993 के बीच ही सत्ता से बाहर रही है।उसके मुख्यमंत्री मानिक सरकार 1998 से लगातार मुख्यमंत्री हैं।साल 2013 के चुनाव में माकपा को 60 में से 49 सीटें मिली थीं।इससे साफ है कि यहां का चुनावी आकंड़ा कमसकम अभी भाजपा के हक मे नही है।2013 के चुनाव में बीजेपी ने 50 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी। 2008 में भी पार्टी के 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी। इसी तरह 2003 में बीजेपी के 21 उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा सके थे। 1998 में पार्टी ने पहली बार राज्य की सारी 60 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी के 58 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।लेकिन अगर पांच साल पुराने आंकड़ों से इतर देखें तो त्रिपुरा मे समीकरण कुछ बदले हुए दिख रहें हैं। भाजपा ने आदिवासी बहुल इस राज्य में स्थानीय निकाय में बेहतर प्रदर्शन कर माकपा को सीधी चुनौती दी है। वह राज्य मे क्षेत्रीय दल आईपीएफटी से गठबंधन की कोशिश भी कर रही है। भाजपा की कोशिश इस वामपंथी गढ़ को ढहाने की है, जिससे संदेश एक राज्य की सत्ता से ज्यादा राजनीतिक होगा।क्यों कि भाजपा और वाम दलों की खुन्नस बहुत पुरानी है।संघ अर्से से राज्य में बीजेपी की जमीन तैयार करने का काम कर रहा है। संघ के चलते ही बीजेपी असम की सत्ता पर विराजमान हुई है।कहा जाता है कि आरएसएस का आदिवासी क्षेत्रों में पर्याप्त जमीनी आधार है।भाजपा ने भी मजबूत संगठनात्मक आधार बनाया है।काबिले गौर है कि संघ संबद्ध संगठन राज्य में
स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहें हैं। इसी मजबूत आधार के जरिए बीजेपी पूर्वोत्तर क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाना चाहती है।
त्रिपुरा के भाजपा अध्यक्ष बिप्लव कुमार देव को केन्द्र सरकार की उज्जवला योजना से भी अपने पक्ष मे माहौल बनता दिख रहा है।देव कहते हैं कि प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत 3.33 लाख महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराए गए हैं। एक परिवार में औसतन चार सदस्यों का हिसाब रखें तो राज्य के 25 लाख में से आधे वोटरों को इसका लाभ मिला है। उनका कहना है कि राज्य के लोग भाजपा के पक्ष में हैं और अगले चुनाव के बाद पार्टी राज्य में सरकार बनाएगी।
त्रिपुरा के लिए बीजेपी ने हिमंत बिस्व सरमा को प्रभारी बनाया है, जिन्हें असम में बीजेपी की सरकार बनवाने का क्रेडिट हासिल है।वैसे त्रिपुरा में भी भाजपा की नजर हिंदू वोटबैंक पर टिकी है।खासकर नाथ संप्रदाय को मानने वाले वोटरों पर।आंकड़ों के हिसाब से त्रिपुरा में तकरीबन 35 फीसदी आबादी नाथ संप्रदाय से है।यानी कुल 30 लाख की आबादी वाले इस राज्य में नाथ संप्रदाय से जुड़े लोगों की संख्या 12-13 लाख है। यानी एक तिहाई आबादी नाथ संप्रदाय को मानती है।इसी लिए त्रिपुरा के लिए बीजेपी के पास एक ट्रंप कार्ड है जिसका नाम है,योगी आदित्यनाथ।ये सवाल जायज है कि यूपी के सीएम त्रिपुरा में ट्रंप कार्ड कैसे हो सकते हैं?दरअसल योगी आदित्यनाथ पूरे देश में नाथ संप्रदाय के प्रमुख माने जाते हैं।बताया जाता है कि योगी को लेकर यहां के लोग खासे उत्साहित भी हैं।वैसे तो योगी आदित्यनाथ बीजेपी के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनावों में भी सफल प्रचार कर चुके हैं। लेकिन त्रिपुरा में वो पार्टी के लिए सबसे बड़े स्टार साबित हो सकते हैं।इस बात को एक और तरह से समझा जा सकता है।दरअसल योगी नाथ संप्रदाय की गोरक्षनाथ पीठ के महंथ भी हैं।
त्रिपुरा में गोरक्षनाथ के दो मंदिर हैं, एक अगरतला में और दूसरा धर्मनगर में।त्रिपुरा में करीब 84 प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है।वहां कई सालों से लेफ्ट को कांग्रेस चुनौती देती आयी है लेकिन अब उसका मुकाबला कांग्रेस की बजाय बीजेपी से है।कांग्रेस की लोकप्रियता राज्य में काफी गिरी है।कांग्रेस कमजोर इसलिए भी हुई है क्योंकि उसके 6 विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और कुछ महीने पहले वो सभी बीजेपी में चले गए हैं। वर्तमान में त्रिपुरा में 51 सीटें लेफ्ट के पास हैं। 3 सीट कांग्रेस और 6 सीट बीजेपी के पास हैं। जहां त्रिपुरा विधानसभा के नतीजों के बाद भाजपा का जीरो बैलेंस था।वहां पर अब उसके 6 विधायक हैं।
एक बात और त्रिपुरा में नाथ संप्रदाय को मानने वाले ओबीसी कोटे में आते हैं, लेकिन उन्हें आरक्षण का फायदा बरसों बाद अब तक नहीं मिल पाया है।एससी और एसटी को मिल रहे 48 फीसदी आरक्षण के कारण त्रिपुरा की माणिक सरकार अब तक हाथ खड़े किये हुए हैं।यही वजह है कि राज्य कि नाथ संप्रदाय को मानने वाली एक तिहाई आबादी को योगी आदित्यनाथ से कुछ ज्यादा ही उम्मीद जग चुकी है। त्रिपुरा की एक-तिहाई जनसंख्या आदिवासी समुदाय से आती है और ये करीब 20 सीटों में किसी उम्मीदवार को जिताने और हराने का माद्दा रखती हैं।बीजेपी इन्ही आदिवासी क्षेत्रो में रैलियां आयोजित करके माणिक सरकार की खामियों को उजागर कर रही है।साथ ही
साथ शहरी क्षेत्रो में भी आक्रामक प्रचार करके लेफ्ट को घेरने का प्रयास कर रही है।वैसे भाजपा अपने चुनाव अभियान में तेजी लाने के मकसद से 31 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी की दो रैलियां आयोजित करने वाली है।भाजपा नेता अपने दावों को मजबूब करने के लिए एक आंकड़ा ये भी पेश कर रहें हैं कि पिछले चुनाव में ऐसी 30 सीटें देखी गयीं जहां लेफ्ट उम्मीदवारों की जीत का फासला तीन हजार से भी कम रहा।बीजेपी को भरोसा है कि इस बार वो ऐसी सारी सीटें अपनी झोली में बटोर सकती है।इसी लिए पहली बार भाजपा को लग रहा
है कि वो त्रिपुरा में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है।लेफ्ट के गढ़ पर कब्जा ज़माने के लिए वह बहुत आतुर है। बीजेपी ने केरल में बहुत कोशिश की थी लेकिन नाकामी हासिल हुई थी।त्रिपुरा के रूप में उसे एक उम्मीद नजर आ रही है।त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने भी स्वीकारा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में केवल लेफ्ट और बीजेपी के बीच ही मुक़ाबला होगा।उन्होंने साथ ही ये भी आरोप लगाया कि बीजेपी अलगाववादी तत्वों से हाथ मिला रही है और धार्मिक एवं जातीय आधार पर राज्य के लोगों को बांटने की कोशिश कर रही है।मतलब साफ हैं लेफ्ट के लिए अपने ही गढ़ में खतरे बहुत हैं।उसे डर लग रहा है कि कहीं बीजेपी आगामी चुनाव में उसे हरा न दे।लेफ्ट त्रिपुरा में कई वर्षो से राज कर रही हैं और इस बार के चुनाव में उसे सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है।वहीं असम में जीत के बाद बीजेपी को लगा कि त्रिपुरा में भी वो जीत का परचम लहरा सकती हैं और उसके बाद से ही बीजेपी के बड़े नेता वहां लगातार अपना दौरा कर रहे हैं।पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने त्रिपुरा में रैली करके पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंकने का काम किया है।
अमितशाह ने तो आदिवासी के घर में खाना भी खाया है ताकि आने वाले चुनाव में उन्हें साधा जा सके।दूसरी तरफ राहुल गांधी का जितना जोर कर्नाटक पर नजर आ रहा है, नॉर्थ ईस्ट को लेकर अभी वैसा कुछ नहीं दिखा है। कर्नाटक में चुनाव मई में होने की उम्मीद है और फरवरी में राहुल गांधी तीन दिन के कर्नाटक दौरे पर जाने वाले हैं।साफ है कि उनमे हिमाचल जैसी भी गम्भीर नही दिख रही है।चुनाव आयोग नें नॉर्थ ईस्ट के तीन राज्यों के लिए बाद मे किसी हुज्जत से बचने के लिए इस बार ईवीएम के साथ वीवीपैट का भी इस्तेमाल करने की घोषणा की है और कहा है कि उम्मीदवारों ईवीएम चेक करने का भी मौका मिलेगा, बशर्ते ऐसा वे चाहते हों। त्रिपुरा में 18 फरवरी को जबकि मेघालय और नगालैंड में 27 फरवरी को वोटिंग होगी।सभी राज्यों के वोटों की गिनती 3 मार्च को होगी और नतीजे भी साथ ही
आएंगे।सारी कवायद के बाद कहा जा सकता है कि त्रिपुरा की माणिक सरकार को बीजेपी का डर सता रहा है।उन्हें शक है कि लेफ्ट का गढ़ कहीं 2018 में मिट न जाये।इसका अंदाजा इस बात से भी लग रहा है कि अपनी ईमानदारी के लिए पहचाने जाने वाले माणिक ने हाल ही में अगरतला में हिंदू संप्रदाय के अनुकूल ठाकुर के समर्थकों के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था जिसको लेकर काफी विवाद पैदा हुआ था कि वामपंथी विचारधारा का मुख्यमंत्री ऐसे कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ।उन्होंने चाहे जिस मकसद से उस कार्यक्रम में हिस्सा लिया हो लेकिन बीजेपी को एक शानदार मुद्दा जरूर थमा दिया।
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